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The Art of Thinking

आओ सोचना सीखें – मन की बड़बड़ से राहत पाएँ

एक काम जो हर इंसान बायडिफॉल्ट करता है, वह है सोचना यानी विचार करना। मगर क्या कभी आपने इस तरह से सोचा है कि

The Art of Thinking

मैंने सोचना कब से शुरू किया…

मुझे अकसर कौन से विचार आते हैं…

कैसे विचार आते हैं…

ऐसे ही विचार क्यों आते हैं…

कब-कब विचार मुझ पर हावी हो जाते हैं…

ये विचार मुझमें कौन से इमोशन जगाते हैं…

नए विचार कैसे पैदा होते हैं और उन विचारों के पैदा होने से मेरी क्या स्थिति हो जाती है?’

उपरो्नत बातों पर मनन करेंगे तो पता चलेगा कि सोचना जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, जिसे कुशलता से करना बहुत ज़रूरी है। यह एक कला है… सोचने की कला…। सुखी, सफल और संतुष्ट जीवन के लिए इस कला में पारंगत होना बेहद ज़रूरी है। स्कूलों में बच्चों को जो सबसे ज़रूरी ट्रेनिंग मिलनी चाहिए, वह यही कि कैसे सोचा जाए?

जिन लोगों को सोचने की कला आती है, वे पृथ्वी पर दूसरों के मुकाबले ज्यादा खुश रहते हैं। वे यह भली-भाँति जानते हैं कि उन्हें कैसी सोच विकसित करनी है, बेलगाम विचारों को कैसे दिशा देनी है, विचारों पर कैसे विचार करना है, तथा उनका अपने विकास के लिए कैसे उपयोग करना है।

यह कला किसी क्लास में बिठाकर या कोचिंग इन्स्टिट्यूट में नहीं सिखाई जा सकती। न ही माँ-बाप इस बात पर ध्यान देते हैं कि बच्चे की सोच को किस तरह विकसित किया जाए। इसलिए सोचना सीखें क्योंकि सोचना भी सीखना होता है। बिना सीखे आप सही सोच नहीं सकते। विचार पर विचार करना ज़रूरी है। कम से कम उन विचारों पर तो अवश्य सोचना चाहिए, जो आपके अंदर दुःख पैदा करते हैं; आपको डर, तनाव, निराशा, असुरक्षा जैसी नकारात्मक भावनाएँ देते हैं। उन पर विचार करके ऐसे नए विचारों का निर्माण करना है, जो उन विचारों की नकारात्मकता को समाप्त कर पाएँ।

उदाहरण के लिए एक छोटा बच्चा स्कूल में नया पेंसिल बॉक्स खोकर आ गया, जो उसके पापा विदेश से लाए थे। बच्चा बड़ा परेशान है। वह यह सोचकर रोने लगा कि ‘अब मैं पापा को क्या बताऊँगा? उन्हें पता चलेगा तो वे मुझ पर गुस्सा करेंगे।’ परंतु जब उसने पापा को डरते-डरते बताया तो पापा ने कहा, ‘कोई बात नहीं स्कूल के ‘लॉस्ट एंड फाउंड’ डिपार्टमेंट में जाकर खोजना और नहीं मिला तो भी डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं तुम्हें नया पेंसिल बॉ्नस लाकर दे दूँगा।’ यह सुनते ही बच्चा रिलैक्स हो गया, उसका सारा डर निकल गया।

ऐसा ही कुछ आपको अपने विचारों के साथ करना है। नए सकारात्मक विचारों से, नकारात्मक विचारों की हवा निकाल देनी है।

सोचने की कला के अंतर्गत जो सबसे महत्वपूर्ण बात सीखनी है, वह यह कि ‘जब भी सोचो तो सोचने के बाद सोचो कि क्या बनकर सोचा।’ यानी आप खुद को क्या (भाई, पिता, पत्नी, माँ आदि) मानकर विचार कर रहे हैं? उसके साथ आपकी क्या पहचान (आइडेन्टिफिकेशन) है? इस बात का विचारों पर गहरा असर होगा।

एक बुज़ुर्ग महिला खाना खाने बैठी है। खाना खाते हुए उसके मन में बड़बड़ शुरू होती है, ‘ये नई बहू कितना बेस्वाद खाना बनाती है… इसकी माँ ने इसे कुछ नहीं सिखाया… भगवान जाने कैसे गृहस्थी चलाएगी…।’ तभी रसोई से उसकी बेटी आकर पूछती है, ‘माँ खाना कैसा बना है, आज मैंने बनाया है?’ सुनकर बुज़ुर्ग महिला के विचार तुरंत बदल गए। अब वह सोच रही है, ‘वाह मेरी बेटी आखिरकार खाना बनाना सीख रही है… थो़ड़ी कमी रह गई है मगर कोई बात नहीं, धीरे-धीरे सुधार हो जाएगा… बनाना शुरू किया वही बड़ी बात है…!’ और वह प्रसन्न मन से खाना खाने लगी।

यदि वह बुज़ुर्ग महिला एक भक्त होती तो किस भाव से खाना खाती, ‘ईश्वर ने आज जैसा प्रसाद दिया, स्वीकार है; उसका धन्यवाद।’

उपरो्नत उदाहरण से समझें कि खाना वही, खानेवाला वही मगर पहचान बदलने मात्र से कैसे भाव और विचार बदल गए। जब उसने स्वयं को एक सास समझा तो उसके अलग विचार थे, जब बेटी की माँ बनकर सोचा तो अलग विचार थे। यदि वह भक्त होती तो अलग विचार होते।

कहने का अर्थ हमारे ज़्यादातर विचार इस बात से जुड़े होते हैं कि उस क्षण हम स्वयं को क्या मानकर जी रहे हैं। जैसे-जैसे हम अपनी पहचान बदलते रहेंगे, हमारे विचार बदलते रहेंगे। हम एक पल में एक होते हैं, दूसरे पल में दूसरे बन जाते हैं। सामनेवाले इंसान को देखकर हमारा रोल बदल जाता है। सामने बॉस आ गया तो हम कर्मचारी बन जाते हैं। सामने कर्मचारी आ गया तो बॉस बन जाते हैं। माता-पिता के सामने बच्चे और बच्चों के सामने माता-पिता बन जाते हैं। वास्तव में देखा जाए तो हम एक ही हैं। अतः हमारी मूल पहचान भी एक ही होनी चाहिए और हमारे सारे विचार उसी मूल आइडेन्टिटी से जुड़े होने चाहिए। यह बात अलग है कि जीवन में हम विभिन्न भूमिकाएँ निभाते हैं मगर हमारे विचार, हमारी मूल पहचान से ही निकलने चाहिए। फिर वे सही, सटीक और सकारात्मक होंगे।

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अब प्रश्न यह है कि हमारी मूल पहचान क्या है? वास्तव में न तो हम शरीर हैं, न ही शरीर द्वारा निभाया जा रहा कोई किरदार। हर किरदार के अंदर छिपा मूल पात्र एक ही है, जो कॉमन है। हर शरीर में वही एक पात्र है, जिसे हम यूनिवर्सल चेतना (सेल्फ, ईश्वर) कहते हैं। अतः जब भी विचार करें तो उस मूल पहचान में स्थापित होकर करें।

विचार करने से पहले मूल पहचान पर पहुँचने के लिए आपको स्वयं से सवाल पूछना होगा, ‘हू एम आय नाउ? इस क्षण मैं कौन हूँ, मेरी असली पहचान क्या है?’ इस एक सवाल के साथ अपनी मूल पहचान को याद करें। इसके बाद जो विचार आएँगे, वे स्त्रोत से उठे हुए ईश्वरीय विचार होंगे। ऐसे विचार जीवन में चल रहे सारे द्वंद, डर, तनाव, चिंता आदि मिटा देंगे।

जैसे किसी को डेंग्ाू हुआ है और वह अस्पताल में ऐडमिट है। उसे मृत्यु के विचार परेशान और भयभीत करने लगे। यदि वह इस विचार पर विचार करे तो पाएगा कि इस समय वह स्वयं को नाशवान शरीर समझकर विचार कर रहा है। जैसे ही वह अपनी मूल पहचान पर पहुँचेगा, उसे याद आएगा कि वह शरीर नहीं बल्कि अजर, अमर, अविनाशी सेल्फ है, उसका सारा भय चला जाएगा। वह सकारात्मक ऊर्जा से भर जाएगा, जिससे उसका रोग भी जल्द ठीक होगा।

अतः जब भी जीवन में दुःखद या गलत विचार आएँ तो समझ लें कि किसी गलत आइडेन्टिटी से जुड़े हैं। सबसे पहले उस समय अपनी पहचान पर विचार कर, मूल पहचान पर लौटें और सही विचार करें। खुद को बार-बार याद दिलाएँ कि पृथ्वी पर आप क्यों आए हैं, आपका मूल लक्ष्य क्या है, इन छोटी-छोटी बातों में उलझने की वाकई ज़रूरत है क्या? कुछ ऐसे ईश्वरीय विचार कहीं लिखकर रखें, जिन्हें पढ़कर आप अपनी मूल पहचान पर लौटते हैं या नकारात्मक विचारों से मुक्त होते हैं। जैसे-

‘मैं ईश्वर की दौलत हूँ, कोई गलत शक्ति मुझे छू नहीं सकती’

‘कुदरत में सबके लिए सब कुछ भरपूर है, अतः मेरे लिए भी भरपूर है। मुझे कमी महसूस करने और असुरक्षित होने की ज़रूरत नहीं’ आदि।

ऐसे ही कुछ अभ्यास से आप अपने विचारों की पहचान पाकर, मन की बड़बड़ से राहत पा सकते हैं।