स्वस्वरूप की यात्रा
क्या जीवन सिर्फ जन्म, अनुभव और मृत्यु तक ही सीमित है? या इसके पार भी कोई ऐसी यात्रा है, जो आपको अपने असली स्वरूप से मिलवाती है?
‘दास्तान-ए-ययाति’ आंतरिक यात्रा की कहानी है, जहाँ हर मोड़ अंतरात्मा को झंझोड़ता है, हर किरदार आपको खुद से मिलवाता है।
यह उपन्यास जीवन की व्यर्थताओं पर सवाल उठाता है कि कैसे हम इंद्रियों के मोह, अहंकार और स्वार्थ की जंज़ीरों से बँधे रहते हैं। परंतु इस जाल से बाहर निकलने का रास्ता भी उपलब्ध है और यहीं है।
यह उपन्यास सिर्फ एक कहानी नहीं, एक आत्मिक अनुभव है। जिसे पढ़ते-पढ़ते आप खुद को नए सवालों में घिरा पाएँगे और उन्हीं सवालों में उत्तर भी खोज लेंगे।
अगर आप जीवन के ऊपरी आवरण से हटकर, उसकी गहराई को समझना चाहते हैं तो यह उपन्यास आपके लिए दर्पण है और एक मार्ग भी। इस बार उपन्यास नहीं, खुद को पढ़िए।



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