Description
उसे भीतर का सहारा खोजने लायक बनाओ
बच्चे की परवरिश कभी सीधी सड़क नहीं होती और जब रास्ते पर चलनेवाला केवल एक अभिभावक हो तो हर मोड़ पर डर होता है। कभी लगता है- सब कुछ संभाल लिया है। फिर मन पूछता है-
* क्या मैं अपने बच्चे के लिए पर्याप्त कर पा रहा/रही हूँ?
* मेरी परिस्थितियाँ कहीं उसकी कहानी तो नहीं लिख रहीं?
* जब वह अपनी राह चुनना चाहेगा तब क्या मैं उसे थामूँगा/ थामूँगी या उस पर भरोसा करके आगे बढ़ने दूँगा/दूँगी?
परवरिश का अर्थ हर मोड़ पर बच्चे के आगे चलना नहीं बल्कि यह समझना है कि कब हाथ थामना है और कब हाथ छोड़कर, उसे आगे बढ़ने देना है।
एक पौधे को शुरुआत में सहारे की ज़रूरत होती है लेकिन हमेशा सहारे से बँधे रहना उसका उद्देश्य नहीं। उसे एक दिन अपनी जड़ों पर खड़ा होना होता है। बच्चे भी ऐसे ही बढ़ते हैं। हमारी ज़िम्मेदारी उन्हें हमारे सहारे पर निर्भर रखना नहीं, अपने भीतर का सहारा खोजने लायक बनाना है।
यह पुस्तक साथ चलती है- स्वयं को सँभालने से लेकर बच्चे और फिर किशोरअवस्था की बदलती दुनिया को समझने तक।
आखिरकार, अच्छी परवरिश का अर्थ यह नहीं कि बच्चा हमेशा हमारा हाथ पकड़े रहे। इसका अर्थ है कि एक दिन वह अपना रास्ता खुद चुन सके और फिर भी उसके भीतर यह विश्वास बना रहे- ‘मैं अकेला नहीं हूँ।’
अकेले रास्ता चलना पड़ सकता है लेकिन परवरिश की यात्रा अकेले नहीं
करनी होती- वह साथ-साथ सीखी जाती है।





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